ग्राम समाचार, गोड्डा। गोड्डा जिले की चर्चित राजमहल परियोजना कोयला खदान में भूमि अधिग्रहण को लेकर आदिवासी रैयतों और ईसीएल मैनेजमेंट के बीच विवाद गहराता जा रहा है। पहाड़पुर बाबूपुर के आदिवासियों ने बिना अधिग्रहण के अपनी जमीन पर किए जा रहे खनन कार्य का लाल झंडी दिखाकर विरोध जताया।
रविवार को ग्रामीणों की ग्राम सभा में निर्णय लिया गया कि जब तक अधिग्रहण प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती और मुआवजा तथा पुनर्वास की स्पष्ट नीति नहीं बनाई जाती, तब तक खनन कार्य नहीं होने दिया जाएगा। इस सभा में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्राम प्रधान, और विभिन्न संगठनों ने भाग लिया।
पहले भी तालझारी मौजा में आदिवासियों ने इसी तरह लाल झंडी लगाकर खनन कार्य रोका था, लेकिन बाद में ईसीएल ने किसी तरह जमीन का अधिग्रहण कर लिया। आज वह क्षेत्र पूरी तरह से कोयला खदान में समाहित हो चुका है, और प्रभावित ग्रामीणों को अब तक बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलीं।
ग्रामीणों का आरोप है कि अभी तक पूर्ण रूप से जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है और ग्राम सभा की बैठक तक नहीं कराई गई, जिसके चलते पहाड़पुर गांव के ग्राम प्रधान को भी बर्खास्त कर दिया गया है। पहले भी तालझारी मौजा में इसी तरह का विरोध हुआ था, लेकिन अंततः वहां की जमीन को अधिग्रहण कर लिया गया और अब यह क्षेत्र खनन से समाप्ति की कगार पर है।
बसडीह मौजा का हाल और भी बुरा है, जहां की जमीन पूरी तरह खनन में चली गई, और गांव टापू बनकर रह गया। अब पहाड़पुर बाबूपुर को भी इसी स्थिति में धकेलने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि ईसीएल प्रबंधन पहले कुछ प्रभावशाली लोगों को अपने पक्ष में कर लेता है और फिर पूरे गांव की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करता है। अधिग्रहण से पहले ग्रामीणों से मधुर संबंध बनाने का दावा खोखला साबित हुआ है। बड़ा भोड़ाई, बसडीहा, तालझारी जैसे गांवों को जबरन विस्थापित किया गया, लेकिन पुनर्वास और मुआवजा अधूरा रह गया।
ग्रामीणों ने सांसद विजय कुमार हांसदा, विधायक धनंजय सोरेन और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि ये जनप्रतिनिधि केवल सतही हस्तक्षेप करते हैं, लेकिन वास्तविक रूप से ईसीएल के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाते। आदिवासी समुदाय का संघर्ष यह दर्शाता है कि बिना उचित पुनर्वास और मुआवजा के भूमि अधिग्रहण स्वीकार्य नहीं होगा। यह सिर्फ पहाड़पुर बाबूपुर की लड़ाई नहीं, बल्कि उन सभी ग्रामीणों की आवाज़ है, जो अपनी जमीन और अधिकार बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अब देखना यह है कि प्रशासन और सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है क्या यह विरोध जन आंदोलन का रूप लेगा, या फिर इसे दबाने की कोशिश की जाएगी?
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